मध्य-पूर्व में लंबे समय से तनाव बना हुआ था, लेकिन फरवरी 2026 के अंत में यह तनाव खुली लड़ाई में बदल गया। अमेरिका और इज़राइल की ईरान के साथ लड़ाई दुनिया के सबसे गंभीर सैन्य संकटों में से एक बन गया है। इस युद्ध का असर केवल इन तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। तेल की कीमतों में तेजी, कई देशों की सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय संगठनों की भागीदारी ने इस संघर्ष को और भी जटिल बना दिया है।
अमेरिका और इज़राइल की ईरान के साथ लड़ाई की शुरुआत कैसे हुई
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त रूप से ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इन हमलों में आधुनिक लड़ाकू विमान, लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। इन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाना और उसकी सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना बताया गया।
इन हमलों के दौरान ईरान की राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में विस्फोटों की खबरें सामने आईं। कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल बेस और परमाणु अनुसंधान केंद्रों को निशाना बनाया गया। अमेरिका और इज़राइल का कहना था कि यदि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नहीं रोका गया तो यह भविष्य में पूरे क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
ईरान के नेतृत्व पर हमला
हमलों के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei को भी निशाना बनाया गया। कई रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद ईरान की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। उनके बाद उनके बेटे Mojtaba Khamenei को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। इस घटना ने पूरे देश में राजनीतिक और सैन्य तनाव को और बढ़ा दिया। ईरान के नेताओं ने इसे सीधा हमला और युद्ध की घोषणा बताया।
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ईरान की जवाबी कार्रवाई
हमलों के तुरंत बाद ईरान ने भी जोरदार जवाब दिया। ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इज़राइल की ओर सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे। इन हमलों का लक्ष्य इज़राइल के सैन्य अड्डे, एयर डिफेंस सिस्टम और रणनीतिक शहर थे। ईरान ने केवल इज़राइल को ही नहीं बल्कि खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को भी निशाना बनाया। कतर, बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर भी मिसाइल हमले किए गए। इन हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया।
मध्य-पूर्व के अन्य देशों पर असर
यह संघर्ष धीरे-धीरे पूरे मध्य-पूर्व में फैलने लगा। लेबनान का शक्तिशाली संगठन Hezbollah भी इस युद्ध में सक्रिय हो गया और उसने इज़राइल के उत्तरी हिस्सों पर हमले शुरू कर दिए। इसके जवाब में इज़राइल ने लेबनान की राजधानी Beirut और अन्य इलाकों में हवाई हमले किए। इस कारण लेबनान और इज़राइल की सीमा पर भी भारी तनाव पैदा हो गया। कई देशों ने अपने नागरिकों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी असर पड़ा।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
इस युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव तेल बाजार पर पड़ा। ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते Strait of Hormuz को बंद करने की धमकी दी। यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के लगभग एक तिहाई समुद्री तेल का व्यापार होता है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा। भारत जैसे देशों के लिए भी यह चिंता का विषय बन गया क्योंकि वे बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं।
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इस युद्ध के पीछे असली कारण
अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से इन देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल तकनीक और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर विवाद चल रहा था। अमेरिका और इज़राइल का आरोप है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।
वहीं ईरान इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है।
इसके अलावा मध्य-पूर्व में ईरान का बढ़ता प्रभाव भी अमेरिका और इज़राइल को चिंतित करता है। ईरान कई क्षेत्रीय संगठनों को समर्थन देता है, जिन्हें इज़राइल अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।
युद्ध रोकने को लेकर अलग-अलग शर्तें
युद्ध को रोकने के लिए दोनों पक्षों की मांगें भी अलग-अलग हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान बिना किसी शर्त के अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि यदि युद्ध रोकना है तो उसके अधिकारों को मान्यता दी जाए, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई की जाए और भविष्य में उस पर हमला न करने की गारंटी दी जाए। इन अलग-अलग शर्तों के कारण शांति वार्ता अब तक सफल नहीं हो पाई है।
वर्तमान स्थिति
मार्च 2026 तक यह संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिका और इज़राइल समय-समय पर ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहे हैं, जबकि ईरान भी जवाबी मिसाइल हमले जारी रखे हुए है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठन और देश इस युद्ध को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो यह पूरे मध्य-पूर्व को बड़े युद्ध की ओर ले जा सकता है। इसका असर वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
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